Guru Ke Bagh

सिख धर्म में गुरु कार्य (सेवा, संगत, लंगर) में उपयोग आने वाले धर्म स्थल के पास स्थित वृक्ष समूहों को गुरु के बाग कहा जाता है। गुरु के बाग आज भी बहुत प्रसिद्ध हैं। अमृतसर में ऐरोड्रम रोड पर स्थित 'गुरु के बाग' जिसके बारे में कहा जाता है कि लड़ाई के समय सिख सैनिकों का जो लंगर चलता था उसमें विविध आवश्यकताओं की पूर्ति इस बाग से होती थी। सिख धर्म में गुरु द्वारों, सरॉय, कुँओं व सरोवरों के निकट विविध प्रकार से उपयोगी वृक्षों के रोपण की परम्परा रही है। स्वयं गुरु साहिब वृक्षों की छाया में बैठकर सेवा कार्यों की देख- रेख करते, दीवान लगा उपदेश देते, भजन कीर्तन गायन का आनन्द लेते थे।

गुरु से जुड़े वृक्ष
कुछ वृक्ष महान गुरुओं के सान्निध्य में आकर हमेशा के लिए धन्य हो गये यथा

  • नानकमता का पीपल वृक्ष: जगत भ्रमण के दौरान दिल्ली से इस स्थल पर पहुँचने पर गुरु नानक देव जी ने इस वृक्ष के नीचे विश्राम किया था, कहते हैं कि पहले यह वृक्ष सूखा था। गुरु महाराज के यहां बैठते ही यह वृक्ष हरा भरा हो गया कुछ मसन्दों द्वारा कालान्तर में इसे जला दिया गया। सिक्खों के छठे गुरु हरगोविन्द जी द्वारा नानकमत पहुँच इस सूखे वृक्ष पर जल में केसर घोल कर छीटें दिये जाने पर वृक्ष पुन: हरा भरा हो गया। यह वृक्ष आज भी हरा है इस घटना के सम्बन्ध में गुरु ग्रन्थ साहब की यह वाणी याद आती है-
                   ।। म. 4।।
                                                     पा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ। 
                                                      पे जंत भए हरीआवले जिनी मेरा सतिगुरु देखिया जाइ।

                अर्थात- जिस भूमि पर प्यारा सतिगुरु आकर बैठा है, वह भूमि हरी- भरी हो गई है। वे जीव हरे हो गए हैं (अर्थात् उन मनुष्यों के हृदय प्रसन्न हो गए हैं), जिन्होंने जाकर                 प्यारे सतिगुरु का दर्शन किया है।
  • रीठा साहब का रीठा वृक्ष: हल्द्वानी से चोरगलिया होते हुए मोरनैला जाने के रास्ते में रीठा साहब गुरु द्वारा पड़ता है। नानक मता से आगे बढऩे पर गुरु नानक देव जी योगी मच्छन्दर नाथ के साथ इस स्थल पर आये थे। वे इस रीठे के वृक्ष के नीचे बैठे थ्रे मच्छन्दर नाथ को भूख लगी थी, गुरु जी ने अपने सेवक मरदाना से सिर के ऊपर की डाल हिलाने की कहा इस डाल से गिरे रीठे मीठे थे जिसे लोगों ने खाया, आज भी मात्र उसी डाल के रीठे मीठे होते हैं। शेष शाखाओं के रीठे कड़वे होते हैं। इसी चमत्कारी वृक्ष के नाम पर इस स्थल पर स्थापित गुरुद्वारे का नाम रीठा साहब पड़ गया।
  • टीली साहब: पंजाबी में शीशम को टाली कहते हैं। गुरु जी ने अमृतसर स्थित संतोखसर में कई वर्ष टाली (शीशम) वृक्ष के नीचे बैठे सतसंग व जाप किया। इस स्थान पर गुरुद्वारा टाली साहब है। पंखो के (करतारपुर) तथा घक्काकोटली (गुरदासपुर) में गुरुओं से सम्बन्धित टाली साहब विद्यमान हैं।
  • बेर साहब: रावी नदी के किनारे करतारपुर (अब पाकिस्तान में) गुरु नानक देव जी के जीवन से सम्बन्धित गुरुद्वारा बेर साहब स्थित है।
  • हरिमन्दिर साहब (अमृतसर) के बेर वृक्ष: यहां सरोवर की परिक्रमा में बेर के प्राचीन वृक्ष हैं जो अलग- अलग कारणों से प्रसिद्ध है।
    • दुख भंजनी बेरी :- चमत्कारिक ऐतिहासिक जनश्रुति से जुड़े इस वृक्ष के बारे में कहा जाता है कि 400 वर्ष पूर्व हाथ पैर व अन्य अंग गल चुका एक काढ़ी इस बेर वृक्ष के नीचे अमृत सरोवर में स्नान करने पर स्वस्थ एवं रोग मुक्त हो गया। मान्यता स्वरूप आज भी लोग इस स्थान पर स्नान करते हैं।
    • बाबा बुढ्ढा जी की बेरी :- इस वृक्ष के नीचे बैठ बाबा बुढ्ढा जी गुरुओं के समय में स्वर्ण मन्दिर, सरोवर तथा परिक्रमा आदि निर्माण कार्यों की सेवा संचालित करते रहे। बाबा बुढ्ढा जी ने स्वयं गुरुओं को गुरु गद्दी का तिलक लगा गद्दी सौंपने का कार्य संपादित किया।
    • पुक्खा सिंह महताब सिंह की बेरी :- भाई सुक्खा सिंह व भाई महताब सिंह ने स्वर्ण मन्दिर की पवित्रता बनाये रखने के लिये ऐयाश मस्सा रँगड़ को खत्म करने से पूर्व दरबार साहब पहुँच अपने घोड़े जिन बेर वृक्षों से बाँधे थे, वे वृक्ष आज भी परिक्रमा में इतिहास की याद दिलाते हैं।
सिख धर्म में वृक्षारोपण:
सिख धर्म में वृक्ष और उपवन (बाग) बड़ी श्रद्धा से देखे जाते हैं इन वृक्षों के दर्शन से अपने गुरु व धर्म के प्रति श्रद्धा में वृद्धि होती है। आम सिख बन्धुओं की धारणा है कि गुरु के नाम पर रोपित वृक्ष व बाग अधिक हरे-भरे व लोक मंगल करने वाले होते हैं। 
सिख धर्म में सेवा, संगत और लंगर का विशेष महत्त्व है। आज के युग में जब वृक्षों के कम हो जाने से मानव का कष्ट बढ़ रहा है, वृक्ष धन अभिवृद्धि कर मानव मात्र का कष्ट घटाना श्रेष्ठतम सेवा है। इस दिशा में सिख धर्म गुरुओं ने पहल की है। सिक्ख धर्म में वृक्ष वन के प्रति श्रद्धा एवं संरक्षण की भावना अद्वितीय है।
आनन्दपुर साहिब गुरुद्वारे के जत्थेदार प्रोफेसर मन्जीत सिंह जी गुरुद्वारा में पधारने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वृक्षारोपण हेतु पौध देते हैं और लोगों को बताते हैं कि सिख धर्म में वृक्षारोपण करने की शिक्षा है। लोगों का कहना हैं कि प्रसाद स्वरूप दिए गये पौधो की सफलता लगभग शत- प्रतिशत होती है। अपने महान सिख गुरूओं की सेवा साधना करने की शिक्षा को ध्यान में रख कर, मानवता की सेवा हेतु वृक्ष लगाने चाहिए व धर्म स्थलों पर गुरु के बाग स्थापित करना चाहिए।